मिल्की वे क्या है?

मिल्की वे क्या है?

किसी साफ़ रात को, शहर की रोशनियों से दूर, आसमान में एक अजीब और खूबसूरत चीज़ दिखती है। एक लंबी, धुंधली, चमकती हुई पट्टी, जो एक छोर से दूसरे छोर तक फैली होती है, जैसे किसी ने अँधेरे आकाश पर दूधिया रोशनी की लकीर खींच दी हो। इसी को देखकर हमारे पूर्वजों ने इसे "आकाश गंगा" कहा, यानी आसमान की गंगा। यूनानी लोग मानते थे कि किसी देवी ने आकाश में दूध बिखेर दिया। आज हम इसे "मिल्की वे" कहते हैं। और असलियत किसी भी कहानी से कहीं ज़्यादा अद्भुत है।

वो चमकती पट्टी कोई बादल नहीं है। वो असल में अरबों-खरबों तारे हैं जो इतने दूर हैं कि हमारी आँखें उन्हें अलग-अलग नहीं देख सकतीं, और सब मिलकर एक धुंधली चमक बन जाते हैं। और सबसे मज़ेदार बात यह है कि तुम मिल्की वे को बाहर से नहीं देख रहे हो। तुम खुद उसके अंदर हो! हमारा सूरज, हमारी पृथ्वी, चाँद, सारे ग्रह, सब कुछ इसी मिल्की वे के एक छोटे से हिस्से में हैं।

मिल्की वे एक "गैलेक्सी" है, यानी तारों, गैस और धूल का एक बहुत बड़ा समूह जो गुरुत्वाकर्षण से एक साथ बंधा हुआ है। हमारी मिल्की वे की आकृति एक घूमते हुए चकरघिन्नी जैसी है, जिसमें तारों की लंबी-लंबी भुजाएँ बीच से बाहर की तरफ घूमती हैं। हमारा सूरज इन्हीं भुजाओं में से एक पर है, बीचोबीच से थोड़ा बाहर की तरफ।

मिल्की वे में 100 से 400 अरब तारे हैं। यह संख्या इतनी बड़ी है कि समझना मुश्किल है। अगर तुम हर सेकंड एक तारा गिनते रहो, बिना रुके, तो सब तारे गिनने में 3000 साल से भी ज़्यादा लग जाएँगे! भारत की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला ने बहुत सुंदर बात कही थी: "जब तुम तारों और आकाशगंगा को देखते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम सिर्फ किसी एक जगह के नहीं, बल्कि पूरे सौरमंडल के हो।"

एक और मज़ेदार बात: रात को खुली आँखों से हम सिर्फ कुछ हज़ार तारे देख सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने एक अच्छा उदाहरण दिया है। सोचो कि पूरी मिल्की वे एक बड़ा पिज़्ज़ा है। हम जितने तारे देख सकते हैं, वो सब उस पिज़्ज़े पर बस एक छोटी सी "पेपेरोनी" के बराबर हैं! जितने तारे हम देख सकते हैं, उससे दो करोड़ गुना ज़्यादा तारे ऐसे हैं जो दिखते ही नहीं।

मिल्की वे के बिल्कुल बीच में एक बहुत बड़ा ब्लैक होल है जिसका नाम है "सैजिटेरियस A*"। यह हमारे सूरज से करीब 40 लाख गुना भारी है। हमारा सौरमंडल इस केंद्र के चारों तरफ घूमता है, लेकिन यह गैलेक्सी इतनी विशाल है कि एक पूरा चक्कर लगाने में 25 करोड़ साल लगते हैं! आखिरी बार जब हमारा सौरमंडल इसी जगह पर था, तब पृथ्वी पर डायनासोर भी नहीं आए थे।

तो अगली बार जब तुम रात में उस धुंधली चमकती पट्टी को देखो, याद रखो: वो तुम्हारा घर है। और वो घर अरबों तारों से भरा हुआ है।

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